वो गोबर से लिपा आँगन
वो मिट्टी का चूल्हा
वो उपलों की आंच पे
झुर्रियों के संग पकती
माँ के हाथ की
गरम गरम रोटी
बरसों बरस देखी है मैंने
मिट्टी के चूल्हे पर
माँ की झुकी पीठ
फूँकनी से बार बार
बुझती आंच को
सुलगाते हुए
तुम इसे माँ की
ममता कहते हो
मैं इसे स्त्री की वेदना
बस यही है अंतर
मेरी तुम्हारी
जीवन दृष्टि का
तुम्हें रास आती है
साँसों को जलाती
हड्डियों सी कड़कड़ाती
दुलार टपकाती रोटी
और मुझे चुभता है
किसी नश्तर सा
सर्प सा उड़ता
आँख में गड़ता धुआँ!
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