Sunday, 25 February 2024

chulha

वो मिट्टी का चूल्हा

वो गोबर से लिपा आँगन
वो मिट्टी का चूल्हा
वो उपलों की आंच पे

झुर्रियों के संग पकती
माँ के हाथ की
गरम गरम रोटी

बरसों बरस देखी है मैंने
मिट्टी के चूल्हे पर
माँ की झुकी पीठ

फूँकनी से बार बार
बुझती आंच को
सुलगाते हुए

तुम इसे माँ की
ममता कहते हो
मैं इसे स्त्री की वेदना

बस यही है अंतर
मेरी तुम्हारी
जीवन दृष्टि का


तुम्हें रास आती है
साँसों को जलाती
हड्डियों सी कड़कड़ाती
दुलार टपकाती रोटी

और मुझे चुभता है
किसी नश्तर सा
सर्प सा उड़ता
आँख में गड़ता धुआँ!

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